बचपन में आप के कानों ने भी श्‍श्‍श्‍श की आवाज खूब सुनी होगी और ये आवाज सुनते ही आप ने सू-सू तो जरूर की होगी। पर अब आप को श्‍श्‍श्‍श की आवाज सुन कर हंसी भी आ रही होगी। पर क्‍या कभी आप ने सोचा है कि जब बच्‍चे छोटे होते हैं तो उन्‍हें श्‍श्‍श्‍श की आवाज पर ही सू-सू क्‍यों आती है। शायद आप ने कभी इस श्‍श्‍श्‍श पर ध्‍यान भी नहीं दिया होगा। पर ये सब के बचपन में होता है। सभी बच्‍चों के माता पिता अपने बच्‍चों को ऐसे ही सू-सू करवाते है।

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रूसी वैज्ञानिक ने किया खुलासा

छोटे बच्‍चों के दिमाग को शुरु से ही श्‍श्‍श्‍श की आवाज के साथ ऐसे तैयार किया जाता है कि उनके कानों में यह आवाज जाते ही वो सू-सू करने लगें। श्‍श्‍श्‍श के पीछे छुपे हुए रहस्‍य को उजागर करने के लिए एक रूसी वैज्ञानिक इवान पावलोव ने इस सब्‍जेक्‍ट पर एक्‍सपीरीमेंट किया। सबसे पहले ये एक्‍सपीरीमेंट एक कुत्ते पर किया गया। कुत्ते को जब भी मीट का टुकड़ा दिया जाता उससे पहले वो हर बार घंटी बजाते। मीट का टुकड़ा पाते ही कुत्ते के मुंह से लार टपकती। हर रोज जब इस प्रक्रिया को लगातार किया गया तो एक वक्त आया जब कुत्ता उस घंटी की आवाज सुनते ही लार टपकाने लगता था।

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आवाज पहचानने लगता है दिमाग

इवान को ये समझ आ गया कि कुत्ते का दिमाग उस घंटी की आवाज़ से ही जान जाता था कि उसे मीट का टुकड़ा मिलने वाला है। कुछ ऐसा ही मां-बाप अपने बच्चों के साथ करते हैं। बच्चों का दिमाग इस बात को समझ जाता है कि श्श्श्श की आवाज आते ही उन्हें पेशाब करनी है। जैसे ही श्‍श्‍श्‍श की आवाज उनके कानों में पड़ती है वैसे ही वो पेशाब करने लगते हैं। आप कभी समूह में सफर कर रहें हों और कोई व्यक्ति पेशाब करने के लिए जाए तो और भी कई लोग पेशाब करने के लिए उतर जाते हैं। ये भी एक तरह का दिमाग का खेल हैं। आप ने अक्‍सर देखा होगा अगर कोई व्यक्ति ऊबासी ले तो उसे देखने वाले को भी ऊबासी आ जाएगी।

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